‘सिर्फ महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी पीड़ित हो सकते हैं’—हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पत्नी की ट्रांसफर अर्जी खारिज

जयपुर। तलाक से जुड़े एक मामले में Rajasthan High Court की जोधपुर बेंच ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पत्नी की ट्रांसफर अर्जी खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि समानता का अर्थ केवल महिलाओं के पक्ष में झुकना नहीं है, बल्कि दोनों पक्षों की परेशानियों को बराबरी से समझना है।

यह आदेश जस्टिस Rekha Borana की सिंगल बेंच ने 5 फरवरी को सुनाया। पत्नी ने 21 मई 2025 को सिविल ट्रांसफर एप्लीकेशन दाखिल कर बीकानेर की फैमिली कोर्ट में चल रहे तलाक मामले को जयपुर ट्रांसफर करने की मांग की थी।


क्या था मामला?

पत्नी का कहना था कि वह वर्ष 2005 से अपने बच्चों के साथ जयपुर में रह रही है और यहीं काम कर अपना खर्च चला रही है। उसने दलील दी कि पति ने तलाक की अर्जी बीकानेर की फैमिली कोर्ट में दायर की है, जबकि अन्य कई मामले जयपुर में लंबित हैं। इसलिए तलाक का मामला भी जयपुर स्थानांतरित किया जाए।


पति की दलील: बीमार मां और बुजुर्ग पिता की जिम्मेदारी

पति ने ट्रांसफर अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा है। उसकी मां कैंसर से पीड़ित हैं और पूरी तरह बिस्तर पर हैं, जबकि पिता की उम्र 80 वर्ष से अधिक है। ऐसे में उनकी देखभाल और इलाज की जिम्मेदारी उसी पर है।

पति पक्ष के अधिवक्ता Uday Shankar Acharya ने कोर्ट में कहा कि यदि फैमिली कोर्ट पत्नी के आने-जाने के खर्च का आदेश देती है तो पति वह खर्च देने को तैयार है।


कोर्ट की सख्त टिप्पणी: समानता दोनों के लिए

हाईकोर्ट ने कहा कि यह सही है कि कई मामलों में महिलाएं पीड़ित होती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पुरुषों की परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया जाए।

अदालत ने माना कि यदि मामला जयपुर ट्रांसफर किया जाता है तो पति को अधिक कठिनाई होगी, क्योंकि वह गंभीर रूप से बीमार मां और बुजुर्ग पिता की देखभाल कर रहा है। ऐसे में बार-बार बीकानेर से जयपुर आना उसके लिए संभव नहीं है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी ने जयपुर में अन्य मामलों के लंबित होने का दावा किया, लेकिन उनके स्पष्ट विवरण प्रस्तुत नहीं किए। इसलिए इस आधार को स्वीकार नहीं किया जा सकता।


पेशी खर्च पर क्या कहा?

आर्थिक असुविधा के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि यदि पत्नी बीकानेर की फैमिली कोर्ट में पेशी खर्च के लिए आवेदन देती है, तो संबंधित कोर्ट उचित आदेश पारित कर सकती है।

इस प्रकार, अदालत ने संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए पत्नी की सिविल ट्रांसफर एप्लीकेशन खारिज कर दी।


ट्रांसफर के कानून की स्थिति

अधिवक्ता उदयशंकर आचार्य के अनुसार, सिविल मामलों में एक अदालत से दूसरी अदालत में केस ट्रांसफर करने का अधिकार हाईकोर्ट को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 24 के तहत प्राप्त है।

ट्रांसफर तभी दिया जाता है जब किसी पक्ष को गंभीर असुविधा हो या निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होने की आशंका हो। अदालत निर्णय लेते समय दोनों पक्षों की दूरी, आर्थिक स्थिति, पारिवारिक जिम्मेदारियां और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखती है।


निष्कर्ष:

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि समानता का अर्थ केवल एक पक्ष को प्राथमिकता देना नहीं, बल्कि दोनों की परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेना है।

बीमार मां और बुजुर्ग पिता की देखभाल कर रहे पति के पक्ष में दिया गया यह आदेश पारिवारिक मामलों में ‘जेंडर न्यूट्रल’ दृष्टिकोण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

Written By

Chanchal Rathore

Desk Reporter

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