भारत में तेजी से बढ़ रही ‘रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा’: हर 750 में 1 मरीज, जीन थेरेपी से लौट सकती है रोशनी

भारत: में आनुवंशिक आंखों की गंभीर बीमारी Retinitis Pigmentosa (आरपी) के मामलों को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता जताई है। डॉक्टरों के मुताबिक यह बीमारी धीरे-धीरे आंखों की रेटिना कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है और समय के साथ व्यक्ति की दृष्टि कमजोर हो जाती है, जो अंततः अंधापन तक पहुंच सकती है।

जयपुर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नेत्र सम्मेलन AIOS Conference 2026 में विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में इस बीमारी के मामले वैश्विक औसत से कई गुना ज्यादा हैं। हालांकि नई Gene Therapy तकनीक से इसके इलाज की उम्मीद बढ़ी है।


भारत में ज्यादा क्यों हैं मामले

प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञ Dr. J.S. Titiyal के अनुसार दुनिया में औसतन हर 4,000 लोगों में से एक व्यक्ति रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा से प्रभावित होता है।

लेकिन भारत में यह दर कहीं अधिक है। यहां लगभग हर 750 लोगों में से एक व्यक्ति इस बीमारी से पीड़ित पाया जाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे मुख्य कारण आनुवंशिक कारक और कुछ समुदायों में पारिवारिक विवाह (consanguinity) हो सकते हैं, जिससे जीन से जुड़ी बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है।


क्या है रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा

रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा एक आनुवंशिक बीमारी है जो आंख की रेटिना को प्रभावित करती है। रेटिना आंख का वह हिस्सा होता है जो प्रकाश को पहचानकर उसे मस्तिष्क तक संकेतों के रूप में भेजता है।

इस बीमारी में रेटिना की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं। इसके शुरुआती लक्षणों में शामिल हैं:

  • रात में देखने में कठिनाई

  • धीरे-धीरे दृष्टि क्षेत्र का कम होना

  • सुरंग जैसी दृष्टि (Tunnel Vision)

  • बाद के चरणों में दृष्टि का लगभग समाप्त हो जाना

यह बीमारी अक्सर बचपन या युवावस्था में शुरू हो सकती है और धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है।


जीन थेरेपी से उम्मीद

विशेषज्ञों के मुताबिक अब जीन थेरेपी इस बीमारी के इलाज में नई उम्मीद बनकर सामने आई है।

कुछ मरीजों में यह बीमारी RPE65 gene में खराबी के कारण होती है। ऐसे मामलों में जीन थेरेपी के जरिए खराब जीन की जगह सही जीन को आंख की कोशिकाओं तक पहुंचाया जाता है।

इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक एक विशेष प्रकार के सुरक्षित वायरस का उपयोग करते हैं, जो सही जीन को रेटिना की कोशिकाओं तक पहुंचाने का काम करता है। जब सही जीन कोशिका तक पहुंच जाता है, तो कुछ कोशिकाएं दोबारा कार्य करना शुरू कर सकती हैं।

हालांकि यह इलाज अभी हर मरीज के लिए उपलब्ध नहीं है, लेकिन जिन मरीजों में विशेष जीन दोष पाया जाता है, उनमें इससे दृष्टि सुधार की संभावना देखी गई है।


मोतियाबिंद सर्जरी में नई तकनीक

सम्मेलन में विशेषज्ञों ने आंखों की अन्य बीमारियों के इलाज में हो रही तकनीकी प्रगति पर भी चर्चा की।

नेत्र विशेषज्ञ Dr. Namrata Sharma ने बताया कि अब मोतियाबिंद के ऑपरेशन में Femtosecond Laser तकनीक का उपयोग बढ़ रहा है।

इस तकनीक की मदद से सर्जरी के कई महत्वपूर्ण चरण अत्यधिक सटीकता से किए जा सकते हैं, जैसे:

  • आंख में बेहद छोटा और सटीक चीरा लगाना

  • लेंस की पतली झिल्ली को सुरक्षित तरीके से खोलना

  • मोतियाबिंद को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ना

लेजर तकनीक के कारण आसपास की कोशिकाओं को कम नुकसान पहुंचता है और कई मामलों में मरीज जल्दी रिकवर भी हो जाते हैं।


80 से अधिक वैज्ञानिक सत्र आयोजित

जयपुर के Jaipur Exhibition and Convention Centre में आयोजित चार दिवसीय इस सम्मेलन में देश-विदेश के सैकड़ों नेत्र विशेषज्ञ शामिल हुए।

कॉन्फ्रेंस के आयोजन सचिव Dr. Mukesh Sharma के अनुसार इस कार्यक्रम के दौरान अब तक 80 से अधिक वैज्ञानिक सत्र आयोजित किए गए, जिनमें विशेषज्ञों ने अपने रिसर्च, जटिल केस स्टडी और नई उपचार तकनीकों के बारे में जानकारी साझा की।

आयोजन अध्यक्ष Dr. Virendra Agarwal ने बताया कि सम्मेलन में कई विषयों पर पैनल डिस्कशन भी हुए, जिनमें आधुनिक तकनीक और भविष्य के इलाज पर चर्चा की गई।


निष्कर्ष

रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा जैसी आनुवंशिक आंखों की बीमारियां धीरे-धीरे दृष्टि को प्रभावित करती हैं और समय रहते इलाज न मिलने पर अंधापन भी हो सकता है। हालांकि जीन थेरेपी और आधुनिक तकनीकों की मदद से अब इसके इलाज की संभावनाएं बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में नई चिकित्सा तकनीकें लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की किरण बन सकती हैं।

Written By

Rajat Kumar RK

Desk Reporter

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