असम: की राजनीति में एक बार फिर हिमंता बिस्वा सरमा का दबदबा कायम हो गया है। भाजपा विधायक दल की रविवार को हुई अहम बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से नेता चुन लिया गया। इसके साथ ही साफ हो गया कि हिमंता 12 मई 2026 को लगातार दूसरी बार असम के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने खुद उनके नाम की औपचारिक घोषणा की।
4 मई को आए विधानसभा चुनाव परिणामों में भाजपा ने 126 में से 82 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया था। इस शानदार जीत के बाद पार्टी के भीतर हिमंता के नेतृत्व पर कोई सवाल नहीं था। अब शपथ ग्रहण समारोह की तैयारियां तेजी से शुरू हो चुकी हैं। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत एनडीए के कई बड़े नेता शामिल हो सकते हैं।
गुवाहाटी में आयोजित भाजपा विधायक दल की बैठक काफी अहम मानी जा रही थी। हालांकि राजनीतिक जानकार पहले से ही मान रहे थे कि हिमंता ही मुख्यमंत्री बनेंगे। बैठक के बाद जेपी नड्डा ने कहा कि पार्टी ने विकास, स्थिरता और मजबूत नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए हिमंता बिस्वा सरमा के नाम पर सहमति बनाई है।
असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा कि राज्यपाल को सरकार बनाने का दावा जल्द पेश किया जाएगा। उन्होंने इसे “ऐतिहासिक क्षण” बताया और कहा कि पीएम मोदी की मौजूदगी में होने वाला यह शपथ ग्रहण समारोह नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति में नया अध्याय साबित होगा।

2023 में असम में हुए परिसीमन ने चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल दिए। मुस्लिम बहुल सीटों की संख्या घटकर 41 से 26 रह गई, जबकि अनुसूचित जनजाति और बोडोलैंड क्षेत्र की सीटें बढ़ीं। इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक नई सीमाओं ने कई सीटों पर भाजपा की स्थिति मजबूत कर दी, जहां पहले विपक्ष का प्रभाव था।
2021 में कांग्रेस और AIUDF साथ लड़े थे, लेकिन इस बार दोनों अलग हो गए। इसका असर मुस्लिम वोट बैंक पर पड़ा और वोटों का बंटवारा हुआ। भाजपा ने इसका रणनीतिक फायदा उठाया।
हिमंता ने “असमिया मुसलमान” और “मियां मुसलमान” के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, जिससे विपक्षी वोटों में विभाजन और गहरा गया।
पूरा चुनाव इस बार हिमंता बिस्वा सरमा के चेहरे पर लड़ा गया। उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठ, असमिया पहचान और हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण को बड़ा मुद्दा बनाया। उनकी रैलियों में उमड़ी भीड़ वोटों में भी बदलती दिखी।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि हिमंता ने खुद को उत्तर भारत के योगी आदित्यनाथ की तरह एक मजबूत हिंदुत्ववादी नेता के रूप में स्थापित कर लिया है।
अरुणोदोई योजना के तहत महिलाओं को आर्थिक सहायता, चाय बागान की महिलाओं को 5 हजार रुपए की मदद और रोजगार के वादों ने भाजपा को ग्रामीण इलाकों में बड़ी बढ़त दिलाई। महिलाओं और युवाओं ने खुलकर भाजपा का समर्थन किया।
चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के कई बड़े नेता भाजपा में शामिल हो गए थे। इससे कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी सामने आई। गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस भाजपा की आक्रामक रणनीति का मुकाबला नहीं कर सकी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह हार नॉर्थ-ईस्ट में कांग्रेस के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।
असम में लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी के बाद हिमंता बिस्वा सरमा का राष्ट्रीय कद और बढ़ सकता है। अभी तक उन्हें नॉर्थ-ईस्ट की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा माना जाता रहा है, लेकिन अब पार्टी उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है।
भाजपा के लिए यह जीत सिर्फ असम तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत में उसकी पकड़ मजबूत होने का संकेत मानी जा रही है।
असम में भाजपा की लगातार तीसरी बड़ी जीत और हिमंता बिस्वा सरमा की दोबारा ताजपोशी यह दिखाती है कि पार्टी ने नॉर्थ-ईस्ट में अपनी मजबूत जड़ें जमा ली हैं। हिमंता का नेतृत्व, आक्रामक रणनीति और सामाजिक योजनाओं का असर भाजपा को बड़ी सफलता दिलाने में अहम साबित हुआ। अब नजर 12 मई के शपथ ग्रहण समारोह और नई सरकार के अगले कदमों पर रहेगी।
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