करीब ढाई घंटे लंबी यह फिल्म कहीं भी बोझिल महसूस नहीं होती। हर दृश्य रंगों, संगीत और भावनाओं से इतना भरा हुआ है कि दर्शक स्क्रीन से नजरें नहीं हटा पाते।
फिल्म की शुरुआत भालका तीर्थ से होती है, जहां श्रीकृष्ण ने अपने अंतिम समय बिताए थे। इसके बाद कहानी जगन्नाथ पुरी मंदिर और श्रीकृष्ण के धड़कते हृदय की आस्था से जुड़ती है। स्वामी के किरदार में जैकी श्रॉफ विज्ञान और विश्वास के बीच एक दिलचस्प बहस छेड़ते हैं।
इसके बाद फिल्म दर्शकों को द्वापर युग में ले जाती है, जहां श्रीकृष्ण के जन्म, गोकुल और वृंदावन की लीलाओं से लेकर द्वारका के राजा बनने तक की यात्रा दिखाई गई है। फिल्म का मुख्य फोकस कृष्ण और राधा के प्रेम, उनके समर्पण और भावनात्मक संबंधों पर है।
इसके साथ ही रुक्मिणी और सत्यभामा से विवाह के प्रसंगों को भी बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है। फिल्म महाभारत की शुरुआत पर खत्म होती है, जिससे अगले दो पार्ट्स के लिए उत्सुकता बढ़ जाती है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके कलाकार हैं। निर्देशक ने किसी बड़े सुपरस्टार की बजाय नए चेहरों पर भरोसा किया और यही फैसला फिल्म के पक्ष में जाता है।
श्रीकृष्ण के किरदार में सिद्धार्थ गुप्ता बेहद प्रभावशाली लगे हैं। उनके चेहरे की मासूमियत, संवादों में ठहराव और आंखों में भावनाओं की गहराई दर्शकों को बांधे रखती है। कई दृश्यों में उनका अभिनय इतना प्रभावी है कि वे सचमुच श्रीकृष्ण जैसे प्रतीत होते हैं।
राधा के रोल में सुष्मिता भट्ट ने कमाल का अभिनय किया है। उनके चेहरे के भाव और कृष्ण के प्रति समर्पण दर्शकों को भावुक कर देता है। ऐसा लगता है जैसे उन्होंने इस किरदार को जिया हो।
रुक्मिणी के रूप में निवासिनी कृष्णन और सत्यभामा के किरदार में संस्कृति जयना ने भी शानदार काम किया है। सभी कलाकारों की केमिस्ट्री फिल्म को और मजबूत बनाती है।

हार्दिक गज्जर इससे पहले ‘देवों के देव महादेव’ जैसे चर्चित शो का निर्देशन कर चुके हैं और इस फिल्म में उनका अनुभव साफ दिखाई देता है।
फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसका विजुअल प्रेजेंटेशन है। द्वारका, वृंदावन और महलों के सेट इतने भव्य हैं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। खास बात यह है कि VFX जरूरत से ज्यादा नहीं लगता, बल्कि कहानी के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा महसूस होता है।
फिल्म के कई दृश्य रोंगटे खड़े कर देते हैं। खासकर वह सीन जहां श्रीकृष्ण द्रौपदी को ‘तथास्तु’ कहते हैं, थिएटर में सन्नाटा छा जाता है।
फिल्म का संगीत इसकी आत्मा है। इरशाद कामिल द्वारा लिखे गए गीत और सोनू निगम व श्रेया घोषाल की आवाज इसे और खास बना देती है।
गानों में कृष्ण और राधा के प्रेम को बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है। हालांकि कुछ गाने थोड़े लंबे लगते हैं और फिल्म की गति को धीमा करते हैं, लेकिन संगीत की मधुरता इसे संभाल लेती है।
फिल्म की गति कुछ हिस्सों में धीमी पड़ती है। खासतौर पर कुछ गानों को छोटा किया जा सकता था। इसके अलावा कृष्ण के बचपन और बाल लीलाओं में इस्तेमाल किए गए ग्राफिक्स को और बेहतर बनाया जा सकता था।
हालांकि ये कमियां फिल्म के भव्य अनुभव के सामने बहुत छोटी लगती हैं।
अगर आप श्रीकृष्ण की कहानियों, भारतीय संस्कृति और भव्य सिनेमाई अनुभव पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए है। यह सिर्फ धार्मिक फिल्म नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और आस्था की कहानी है।
परिवार के साथ थिएटर में देखने के लिए यह एक शानदार फिल्म साबित हो सकती है।
‘कृष्णावतारम पार्ट 1: हृदयम’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भावनाओं और आस्था की यात्रा है। सिद्धार्थ गुप्ता ने श्रीकृष्ण के किरदार को नई पहचान दी है और निर्देशक हार्दिक गज्जर ने इसे भव्यता के साथ पेश किया है। अगर आप दिल से जुड़ने वाली फिल्में पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपको जरूर प्रभावित करेगी।
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