अमेरिका: में डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों को लेकर बड़ा राजनीतिक और कानूनी संकट खड़ा हो गया है। अमेरिकी संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए 10 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ को गैर-कानूनी बताते हुए रद्द कर दिया है। इस फैसले के बाद पूरी दुनिया में व्यापारिक अनिश्चितता बढ़ गई है और भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर भी नए सवाल खड़े हो गए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी अदालतों द्वारा ट्रंप की व्यापार नीतियों पर लगातार लगाई जा रही रोक यह संकेत देती है कि अमेरिका की टैरिफ व्यवस्था फिलहाल स्थिर नहीं है। ऐसे में भारत को किसी भी बड़े व्यापारिक समझौते में जल्दबाजी से बचना चाहिए।
डोनाल्ड ट्रंप ने 24 फरवरी को दुनिया भर से अमेरिका आने वाले कई उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगाने का फैसला किया था। यह कदम उन्होंने अमेरिकी उद्योगों को बचाने और व्यापार घाटे को कम करने के नाम पर उठाया था।
हालांकि अमेरिकी संघीय अदालत ने 7 मई को दिए गए अपने फैसले में कहा कि ट्रंप प्रशासन ने ऐसा करके 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत मिली सीमित शक्तियों का दुरुपयोग किया है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह वैश्विक टैरिफ लागू करना कानून के खिलाफ है।
भारत और अमेरिका पिछले कुछ समय से द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर चर्चा कर रहे हैं। लेकिन अब अमेरिकी व्यापार नीति पर पैदा हुई अनिश्चितता ने इस बातचीत को प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक भारत को फिलहाल इंतजार करना चाहिए। उनका कहना है कि अमेरिका अपने आयात शुल्क कम करने के लिए तैयार नहीं दिख रहा, जबकि भारत पर बाजार खोलने का दबाव बनाया जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार अगर भारत जल्दबाजी में समझौता करता है, तो यह एकतरफा साबित हो सकता है, जहां अमेरिका को फायदा ज्यादा और भारत को नुकसान अधिक होगा।

फिलहाल अदालत का फैसला केवल उन कंपनियों और राज्यों पर लागू हुआ है जिन्होंने यह मुकदमा दायर किया था। इनमें वाशिंगटन राज्य, मसाला आयातक कंपनी Burlap & Barrel और खिलौना निर्माता Basic Fun शामिल हैं।
बाकी आयातकों को अभी भी यह टैरिफ चुकाना पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिकी सरकार इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकती है।
यानी अमेरिका की व्यापार नीति पर कानूनी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है।
विश्व व्यापार संगठन (WTO) के पूर्व निदेशक शिशिर प्रियदर्शी ने इस फैसले को अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत बताया है।
उनका कहना है कि ट्रंप के टैरिफ वैश्विक व्यापार नियमों के खिलाफ थे और अदालत का फैसला यह साबित करता है कि बहुपक्षीय व्यापार नियम अभी भी मजबूत हैं।
इस फैसले के बाद उम्मीद की जा रही है कि अमेरिका की व्यापार प्रणाली दोबारा पुराने MFN (Most Favoured Nation) ढांचे की तरफ लौट सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत से झटका मिलने के बाद ट्रंप प्रशासन अब अन्य कठोर कानूनों का सहारा ले सकता है।
संभावना जताई जा रही है कि अमेरिका अब धारा 301 और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी धारा 232 के तहत नए व्यापारिक प्रतिबंध लगा सकता है।
इनका असर स्टील, ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिज क्षेत्रों पर पड़ सकता है। भारत भी इन सेक्टर्स में प्रभावित देशों में शामिल हो सकता है।
अमेरिका में चल रही कानूनी अनिश्चितता का असर दूसरे देशों पर भी दिखने लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक मलेशिया ने अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं से कदम पीछे खींच लिए हैं।
कई अन्य देश भी अमेरिका के साथ होने वाले नए कर समझौतों पर पुनर्विचार कर रहे हैं।
ऐसे में भारत के सामने भी चुनौती यही है कि वह जल्दबाजी में कोई ऐसा फैसला न करे, जिसका दीर्घकालिक असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़े।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अभी सतर्क रणनीति अपनानी चाहिए। जब तक अमेरिका अपनी व्यापार नीति को कानूनी और राजनीतिक रूप से स्थिर नहीं कर लेता, तब तक भारत को बड़े व्यापारिक समझौतों में सावधानी बरतनी चाहिए।
भारत के लिए यह समय अपने घरेलू उद्योगों को मजबूत करने और वैकल्पिक वैश्विक साझेदारों पर फोकस करने का भी हो सकता है।
अमेरिकी अदालत द्वारा ट्रंप के टैरिफ फैसले को रद्द किया जाना केवल अमेरिका की राजनीति नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यापार व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत है। भारत के लिए यह समय सोच-समझकर कदम उठाने का है। विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हालात में जल्दबाजी में ट्रेड डील करना जोखिम भरा हो सकता है। आने वाले दिनों में अमेरिका की कानूनी और व्यापारिक स्थिति भारत की रणनीति तय करेगी।
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