236 सीटों पर जमानत जब्त, फिर बीजेपी के गढ़ में जीत: कैसे बदली प्रशांत किशोर की सियासी कहानी?

 बांकीपुर उपचुनाव में पहली जीत से जन सुराज को मिली नई पहचान, क्या बिहार में उभर रहा है तीसरा राजनीतिक विकल्प?

पटना।बिहार की राजनीति में कभी चुनावी रणनीतिकार के रूप में पहचान बनाने वाले प्रशांत किशोर अब एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। वजह है बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में उनकी ऐतिहासिक जीत। यह जीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि कुछ महीने पहले हुए 2025 बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी जन सुराज का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा था। पार्टी ने 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन 236 सीटों पर उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। उस समय राजनीतिक विश्लेषकों ने जन सुराज के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए थे।

हालांकि विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद प्रशांत किशोर ने हार नहीं मानी। उन्होंने बड़े-बड़े चुनावी आयोजनों की बजाय संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने की रणनीति अपनाई। वार्ड स्तर की बैठकों, मोहल्ला संवाद, घर-घर संपर्क अभियान और स्थानीय कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर पार्टी ने अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का प्रयास किया। इसी रणनीति का असर बांकीपुर उपचुनाव में देखने को मिला।

बांकीपुर सीट बिहार की सबसे प्रतिष्ठित और चर्चित सीटों में गिनी जाती है। वर्ष 1995 से इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा रहा है और इसे लंबे समय से बीजेपी का मजबूत शहरी गढ़ माना जाता रहा है। ऐसे में इस सीट पर जन सुराज की जीत को सामान्य चुनावी सफलता नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

चुनाव प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने जातीय और धार्मिक समीकरणों से हटकर शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य और बेहतर प्रशासन जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनका दावा था कि बिहार की राजनीति को जाति आधारित विमर्श से निकालकर विकास आधारित राजनीति की ओर ले जाने की जरूरत है। यही संदेश धीरे-धीरे मतदाताओं तक पहुंचा और चुनाव परिणाम में इसका असर दिखाई दिया।

मतगणना पूरी होने के बाद प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार को करीब 19 हजार वोटों के अंतर से हराकर अपनी पहली चुनावी जीत दर्ज की। यह केवल व्यक्तिगत जीत नहीं, बल्कि जन सुराज पार्टी के लिए भी पहली बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस जीत ने यह साबित किया है कि 2025 की करारी हार के बावजूद जन सुराज का जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बांकीपुर की यह सफलता आने वाले समय में बिहार की राजनीति में तीसरे राजनीतिक विकल्प को मजबूत करेगी, या फिर यह जीत केवल एक उपचुनाव तक ही सीमित रह जाएगी।

फिलहाल इतना तय है कि 236 सीटों पर जमानत जब्त होने से लेकर बीजेपी के तीन दशक पुराने गढ़ में जीत दर्ज करने तक का सफर प्रशांत किशोर के राजनीतिक करियर का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बन गया है। आने वाले चुनावों में यह जीत बिहार की राजनीति की दिशा और दशा पर कितना प्रभाव डालती है, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

 

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