जयपुर: राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव में मेयर, सभापति और नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव के बाद स्थानीय निकायों की तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। सात नगर निगमों के मेयर चुनाव में भाजपा ने छह पदों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस को सिर्फ बीकानेर में सफलता मिली। खास बात यह रही कि अजमेर और पाली में कांग्रेस वार्ड चुनाव में सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद मेयर की कुर्सी हासिल नहीं कर सकी।
इन नतीजों ने एक बार फिर यह दिखाया कि स्थानीय निकाय चुनाव में केवल पार्षदों की संख्या ही पर्याप्त नहीं होती। बहुमत का आंकड़ा जुटाने, निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल करने और मतदान के दिन अपने पार्षदों को एकजुट रखने की रणनीति भी अहम भूमिका निभाती है।
अजमेर नगर निगम में कांग्रेस ने 80 में से 37 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी स्थिति बनाई थी। भाजपा के 32 और निर्दलीयों के 11 पार्षद चुने गए थे। मेयर चुनाव में बहुमत का आंकड़ा 41 था। ऐसे में कांग्रेस को बहुमत के लिए चार अतिरिक्त वोटों की जरूरत थी।
मेयर चुनाव में भाजपा की अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी किरण गड़वाल को 37 वोट मिले। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के मुताबिक भाजपा को सभी 11 निर्दलीयों का समर्थन मिला। इस तरह वार्ड चुनाव में पीछे रहने के बावजूद भाजपा मेयर की कुर्सी हासिल करने में सफल रही।
कांग्रेस ने चुनाव से पहले अपने पार्षदों की बाड़ेबंदी कर्नाटक के बेंगलुरु में किए जाने की बात कही थी। पार्टी नेताओं ने पार्षदों पर कथित दबाव और उत्पीड़न के आरोप भी लगाए थे। इन आरोपों को लेकर भाजपा की ओर से अलग रुख सामने आया।
पाली नगर निगम में भी वार्ड चुनाव का गणित कांग्रेस के पक्ष में था। 65 सदस्यीय निगम में कांग्रेस ने 29 वार्ड, भाजपा ने 21 और निर्दलीयों ने 15 वार्ड जीते थे। बहुमत का आंकड़ा 33 था।
लेकिन मेयर चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई। भाजपा की नमिता बुबकिया को 33 वोट मिले और उन्होंने मेयर पद पर जीत दर्ज की। निर्दलीय राजबाला हिंगड़ को 29 वोट मिले, जबकि कांग्रेस की आधिकारिक उम्मीदवार सुमित्रा जैन को महज तीन वोट मिले।
इस परिणाम ने कांग्रेस के सामने पार्टी के भीतर समर्थन और फ्लोर मैनेजमेंट को लेकर सवाल खड़े किए हैं। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद डोटासरा ने चुनावी नतीजों की समीक्षा और पार्टी के खिलाफ काम करने वालों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की बात कही है।
राजस्थान के सात नगर निगमों में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी राहत बीकानेर से आई। 80 सदस्यीय नगर निगम में कांग्रेस ने वार्ड चुनाव में 42 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। भाजपा के पास 27 सीटें थीं।
मेयर चुनाव में कांग्रेस के अनिल कल्ला ने भाजपा के सुरेंद्र सिंह शेखावत को 50-30 के अंतर से हराया। इस जीत के साथ कांग्रेस ने बीकानेर नगर निगम में अपना बोर्ड कायम रखा।
बीकानेर में कांग्रेस के लिए स्थिति इसलिए भी आसान रही क्योंकि उसके पास पहले से ही बहुमत का आंकड़ा था। मेयर चुनाव में अनिल कल्ला को कांग्रेस की घोषित ताकत से भी अधिक वोट मिले।
अब तक तय सात नगर निगमों के मेयर पदों में भाजपा ने छह नगर निगमों—अजमेर, अलवर, भरतपुर, भीलवाड़ा, पाली और उदयपुर में जीत दर्ज की है। कांग्रेस को सिर्फ बीकानेर में सफलता मिली है।
हालांकि जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगमों के मेयर चुनाव अभी 25 सितंबर को होने हैं। इसलिए राज्य के सभी प्रमुख नगर निगमों की तस्वीर अभी पूरी तरह अंतिम नहीं हुई है।
इन चुनावों में निर्दलीय पार्षद कई जगह निर्णायक भूमिका में नजर आए। अजमेर और पाली जैसे निगमों में भाजपा और कांग्रेस में से किसी के पास अपने दम पर बहुमत नहीं था। ऐसे में निर्दलीय पार्षदों का समर्थन मेयर चुनाव का रुख बदलने में अहम रहा।
राज्य के 309 शहरी निकायों में शीर्ष पदों के चुनाव की प्रक्रिया भी चरणबद्ध तरीके से चल रही है। 21 सितंबर को 273 निकायों में प्रमुख पदों के लिए चुनाव हुए, जबकि कुछ निकायों में निर्विरोध निर्वाचन पहले ही हो चुका था।
निकाय चुनाव के इन नतीजों में कांग्रेस के सामने दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आई हैं। बीकानेर में स्पष्ट बहुमत के चलते पार्टी अपने वार्ड प्रदर्शन को मेयर की जीत में बदलने में सफल रही, जबकि अजमेर और पाली में सबसे बड़ा दल होने के बावजूद बहुमत के लिए जरूरी समर्थन जुटाना चुनौती साबित हुआ।
वहीं भाजपा ने कम पार्षद होने के बावजूद अजमेर और पाली में निर्दलीयों और अन्य समर्थन के जरिए मेयर पद हासिल किया। ऐसे में ये चुनाव राजस्थान की शहरी राजनीति में संख्या बल के साथ-साथ निर्दलीयों की भूमिका, स्थानीय नेतृत्व और फ्लोर मैनेजमेंट के महत्व को भी सामने लाते हैं।
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