राजस्थान निकाय चुनाव: टिकट बंटने के बाद कांग्रेस के सामने बागियों की चुनौती, कई वार्डों में अपनों से ही मुकाबला

जयपुर: राजस्थान में नगरीय निकाय चुनाव को लेकर कांग्रेस ने टिकट वितरण की प्रक्रिया पूरी कर चुनावी मैदान में अपनी बिसात बिछा दी है। टिकटों के ऐलान के बाद अब पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। कई जगह टिकट से वंचित दावेदारों और नाराज कार्यकर्ताओं ने बगावत का रास्ता अपना लिया है। ऐसे में कांग्रेस को अब बीजेपी के साथ-साथ अपने ही बागियों से भी मुकाबला करना पड़ सकता है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा की अगुवाई में पार्टी ने टिकट वितरण को लेकर लंबे समय तक मंथन किया। स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से फीडबैक लेने के साथ ही जिला प्रभारियों और विधानसभा पर्यवेक्षकों को जिम्मेदारियां दी गईं। जिताऊ चेहरों की तलाश, स्थानीय समीकरण और संगठन की पकड़ को ध्यान में रखते हुए उम्मीदवारों के नाम तय किए गए।

10 हजार से ज्यादा वार्डों में उतारे उम्मीदवार

नगरीय निकाय चुनाव में कांग्रेस ने 10 हजार से अधिक वार्डों के लिए उम्मीदवारों का चयन किया है। पार्टी ने इस बार टिकट वितरण में युवा चेहरों को भी प्राथमिकता दी है। कांग्रेस की ओर से करीब 50 फीसदी टिकट युवाओं को देने की रणनीति अपनाई गई, ताकि संगठन में नई पीढ़ी को आगे लाया जा सके।

टिकट वितरण से पहले पार्टी ने दावेदारों से फीडबैक लेने और स्थानीय परिस्थितियों को समझने की कोशिश की। इसके लिए कई स्तरों पर बैठकें हुईं और संभावित उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा की गई।

टिकट घोषित होते ही शुरू हुई बगावत

कांग्रेस की टिकट वितरण प्रक्रिया पूरी होने के बाद कई जगहों पर पार्टी के भीतर नाराजगी सामने आने लगी है। जिन दावेदारों को टिकट नहीं मिला, उनमें से कुछ ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है।

ऐसे बागी अब कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशियों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। खास तौर पर उन वार्डों में जहां टिकट के कई मजबूत दावेदार थे, वहां बगावत का असर सीधे चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।

डोटासरा की रणनीति की अब असली परीक्षा

पिछले कई वर्षों से प्रदेश कांग्रेस संगठन की कमान संभाल रहे गोविंद सिंह डोटासरा के लिए टिकट वितरण के बाद अब चुनावी मैदान में रणनीति को जमीन पर उतारना बड़ी चुनौती है।

टिकट वितरण के दौरान पार्टी ने स्थानीय समीकरण, संगठन की स्थिति और उम्मीदवार की जीत की संभावनाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की। लेकिन अब सवाल यह है कि टिकट नहीं मिलने से नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के समर्थन में कैसे वापस लाया जाएगा।

भीलवाड़ा में सामने आया विवाद

टिकट वितरण को लेकर कुछ जगहों पर विवाद भी सामने आए हैं। भीलवाड़ा में नेताओं के बीच आपसी विवाद के चलते पार्टी प्रत्याशियों को सिंबल देने की प्रक्रिया प्रभावित होने की बात सामने आई। ऐसे घटनाक्रम कांग्रेस के लिए संगठनात्मक चुनौती को और बढ़ा रहे हैं।

स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच मतभेद और कार्यकर्ताओं की नाराजगी अगर समय रहते दूर नहीं हुई, तो इसका सीधा फायदा विरोधी दलों को मिल सकता है।

बीजेपी से ज्यादा अपनों से मुकाबले की चुनौती

निकाय चुनाव में कांग्रेस के सामने मुख्य मुकाबला बीजेपी से है, लेकिन टिकट वितरण के बाद कई वार्डों में पार्टी को अपनों से ही मुकाबला करना पड़ सकता है।

बागी प्रत्याशी अगर चुनाव मैदान से हटकर पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार का समर्थन करते हैं तो कांग्रेस को राहत मिल सकती है। वहीं, अगर नाराज दावेदार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में डटे रहते हैं तो कांग्रेस के वोटों में सेंध लगने की आशंका बढ़ जाएगी।

अब बागियों को मनाने की जिम्मेदारी

कांग्रेस के लिए अगला चरण बागियों को साधने का है। पार्टी को नाराज दावेदारों से बातचीत कर उन्हें मनाने और अधिकृत प्रत्याशियों के समर्थन में खड़ा करने की रणनीति पर काम करना होगा।

कुल मिलाकर कांग्रेस ने टिकट वितरण की कवायद तो पूरी कर ली है, लेकिन टिकट की बाजी के बाद अब बागियों को साधना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। अगर पार्टी नाराज नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में सफल रहती है तो चुनावी रणनीति को मजबूती मिलेगी। लेकिन बागी मैदान में डटे रहे तो कई वार्डों में कांग्रेस का चुनावी गणित बिगड़ सकता है।

अब देखना होगा कि कांग्रेस नेतृत्व टिकट से नाराज नेताओं को कितनी जल्दी साध पाता है और चुनावी मैदान में पार्टी की एकजुटता कितनी मजबूत रह पाती है।

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